ग़ज़ल शायरी की वो सिन्फ़ है जिस के लुगवी मअनी महबूब से बात करना होता है, लेकिन जदीद ग़ज़ल में शायर महबूब के अलावा दुनिया और मुआशरे के मुख़्तलिफ़ पहलुओं पर अपने ख़्यालात पेश करता है, इस तरह आज जदीद ग़ज़ल दुनिया से बातें करने का ज़रीया बन चुकी है।
इसी जदीद ग़ज़ल को अपना नसब उल-ऐन बना कर जनाब इक़बाल अदीब काशीपुरी एक अर्सा-ए-दराज़ से शायरी कर रहे हैं, आप का पूरा नाम मुहम्मद इक़बाल और क़लमी नाम इक़बाल अदीब काशीपुरी है। आपका ताल्लुक़ काशीपुर के एक इल्मी व अदबी घराने से है। आपके वालिद का नाम मुबारक हुसैन ‘अहमर’ और वालिदा का नाम अनवरी बेगम है। इक़बाल अदीब 9 जनवरी 1954 को हिन्दुस्तान की शुमाली रियासत उत्तराखण्ड के तराई ज़िला उधम सिंह नगर के तारीख़ी और सनअती शहर काशीपुर में पैदा हुए। इंटरमीडिएट तक तालीम मुकम्मल करने के बाद उन्होंने अपना कारोबार शुरू किया। उर्दू अदब और मौसीक़ी का शौक और गहरी समझ रखने वाले इक़बाल अदीब शायरी को दुनिया में बेदारी पैदा करने का एक मौस्सिर ज़रीया मानते हैं।
आपके वालिद-ए-मुहतरम जनाब अहमर काशीपुरी एक मशहूर और कामयाब शायर थे, वो उर्दू अदब से गहरी मोहब्बत रखते थे और उनका शुमार मुल्क के नामवर शायरों में किया जाता था। आपने अपने वालिद-ए-गिरामी की सरपरस्ती में ग़ज़ल की बारिकियाँ सीखीं और उनके साथ बहुत से मुशायरों और नशिस्तों में शिरकत फ़रमाई। आपने अपनी शायरी में रोज़मर्रा की छोटी-बड़ी बातों को बहुत सादगी और सादा ज़ुबान में पेश किया है। सादा ज़ुबान और आम-फ़हम शायरी की बदौलत आपकी हर जगह तारीफ की गई। मुशायरों में आपकी शिरकत का सिलसिला 1975 से शुरू हुआ और अख़बारात में आपके कलाम की इशाअत का सिलसिला 1976 में मकामी ख़बरनामा से हुआ। इसके बाद रोज़नामा 'मलाप,' 'क़ौमी जंग' और दीगर कई अख़बारों और रिसालों में आपकी शायरी शाया होती रही। आपने कई सालों तक ऑल इंडिया रेडियो से मुस्तक़िल प्रोग्राम पेश किए हैं। इसके बाद आपने टीवी चैनल ज़ी सलाम के कई मुशायरों में भी शिरकत फ़रमाई। आपने पुराने दौर के मशहूर-ओ-माअरूफ शुअरा किराम जैसे जनाब गौहर अस्मानी, रईस रामपुरी, मो अली मौज, मोनस बरेली, होश नोमानी, अज़हर इनायती, वसीम बरेलवी, साहिल सहरी, डॉक्टर शाकिर हुसैन इसलाही, फ़हमी बदायूनी, ज़फ़र काशीपुरी, नश्तर काशीपुरी और मनोज आर्य साहब के साथ तवील अर्से तक नशिस्तों और मुशायरों में शिरकत फ़रमाई। ये तमाम शुअरा भी आपकी शायरी और हुनर के मुतरिफ़ रहे हैं। मुकामी ऐतबार से जनाब प्रोफ़ेसर आसिफ़ हुसैन, डॉक्टर यूसुफ़ बहादुर ख़ान, मास्टर मुहम्मद फ़ारूक, मास्टर मुहम्मद इदरीस, मुहम्मद उमर क़ाज़ी, अज़ीज़ क़ुरैशी, हनफ़ी काशीपुरी, पैयाम काशीपुरी, डॉक्टर अहमद काशीपुरी, खंजर काशीपुरी, आसिम काशीपुरी, क़तील काशीपुरी, मुबारक हुसैन मुशफ़िक़, सग़ीर अशरफ़, इंजीनियर मुहम्मद इक़बाल, इंजीनियर इरफ़ान हमीद, अमीन जसपूरी, अख़्तर जसपूरी, नक़ी अनवर, तुफ़ील चतुर्वेदी और नवचेतना कल्चरल कमेटी के सरबराह जनाब विमल गड़िया जी से आपके गहरे मरासिम रहे हैं।
आपके अदबी और इल्मी ख़िदमात के एतिराफ़ में आपको प्रेस क्लब, लाइंस क्लब और 20 के क़रीब समाजी व अदबी तंज़ीमों की जानिब से एज़ाज़ात से नवाज़ा जा चुका है। जनाब इम्तियाज़ ग़ाज़ी इलाहाबाद की किताब "सदी के 100 शायर" में भी आपके कलाम को शामिल किया गया है। आप अर्सा-ए-दराज़ से समाजी व तालीमी इदारा शम्सुल-उलूम हाई स्कूल काशीपुर के सरबराह की हैसियत से ख़िदमात सरअंजाम दे रहे हैं।
अगरचे शायरी आपको विरासत में मिली है लेकिन सच्ची लगन और मेहनत की वजह से आपने उर्दू अदब में अपना एक ख़ास मुकाम बनाया है। आपने हमेशा उर्दू के मुश्किल और पेचीदा अल्फ़ाज़ से गुरेज़ किया है। आपने ग़ज़ल को इतना आसान और आम-फ़हम ज़ुबान में दुनिया के सामने पेश किया है गोया वो क़ारी से उसी की ज़ुबान में गुफ्तगू करते नज़र आते हों। आपका कलाम हुस्न-ओ-इश्क़ और जाम-ओ-मीना के अलावा आज के हालात का भी इज़हार करता है और मुआशरे और इस में दरपेश तमाम छोटी-बड़ी परेशानियों की तर्जुमानी करता है।
आपकी शायरी में आपके वालिद-ए-मुहतरम का रंग तो नज़र आता है लेकिन आपके यहाँ जदीद ग़ज़ल का रंग भी देखने को मिलता है। आपकी शायरी एक नौजवान के दिल की कैफ़ियत बयान करती है जिस की वजह से आज के नौजवान आपको अपना आईडियल मानते हैं।
आपने शायरी के मुख़्तलिफ़ अस्नाफ़ पर अपनी सलाहियतों का मुज़ाहिरा किया है जिस में ख़ास तौर पर ग़ज़ल, हम्द, क़ता और गीत शामिल हैं। आपके लिखे हुए कई गीत निजी एल्बमों की ज़ीनत बन चुके हैं जिन को मुहम्मद नफ़ीस, अपूर्व पंत और मुहम्मद नईम ने बेहद ख़ूबसूरती से गाया और फिल्माया है।
आप आज भी अपनी मसरूफ़ियात से कुछ वक़्त निकाल कर मुकामी सतह पर और मुख़्तलिफ़ शहरों में होने वाले मुशायरों और नशिस्तों में शिरकत फ़रमाते हैं और साथ ही डिजिटल मीडियम के ज़रीए मुशायरों का इनअक़ाद भी करते हैं। जनाब इक़बाल अदीब आज भी शायरी से गहरा लगाव रखते हैं और शेर कहने का ये सिलसिला आज भी जारी रखे हुए हैं। आपकी शायरी की ये रिवायत यहीं ख़त्म नहीं होती आपके साहबज़ादे शारिक सिद्दीकी भी एक बेहतरीन नौजवान शायर हैं। वो अपने दादा मुहतरम और वालिद-ए-मुहतरम की इस विरासत को आगे बढ़ाने की ज़िम्मेदारी बखूबी अंजाम दे रहे हैं। आपका ख़ानदान तीन नस्लों से काशीपुर जैसे ग़ैर-उर्दू इलाक़ा में उर्दू की शम्अ को रौशन किए हुए है।
आपके कलाम को यकजा़ करने और कंपोज़िटिंग करने में बड़ी जाँफि़शानी की गई है जिसे उर्दू और हिंदी में एक साथ शाया कराया जा रहा है। मैं इस काम के लिए जनाब प्रोफ़ेसर आसिफ़ हुसैन, बड़े भाई असरार अहमद और तमाम दोस्त-ओ-अक़ारिब का मशकूर हूँ जिनकी कोशिश और मशवरों से ये मुश्किल काम पाया-ए-तक्मील को पहुंच सका।
चूँकि कोई भी अमल ख़तमी नहीं होता, इस में तरमीम की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है। इस लिए आप सभी हज़रात से गुज़ारिश है कि इस इंतिख़ाब को मज़ीद बेहतर बनाने के लिए अपने नेक मशवरों से नवाज़ें। मुझे न सिर्फ़ उम्मीद है बल्कि पूरा यक़ीन है कि आप इस अदना सी कोशिश को ज़रूर सराहेंगे।
आपकी दुआओं का मुन्तज़िर।
संकलक-
मुहम्मद जलीस सिद्दीकी
अली ख़ॉं काशीपुर, उत्तराखण्ड
غزل
شاعری کی وہ صنف ہے جس کے لغوی معنی محبوب سے بات کرناہوتا ہے، لیکن جدید غزل میں شاعر محبوب کے علاوہ دنیا
اور معاشرے کے مختلف پہلوؤں پر اپنے خیالات پیش کرتا ہے، اس طرح آج جدید
غزل دنیا سے باتیں کرنے کا ذریعہ بن چکی
ہے
۔
اسی جدید غزل کو اپنا نصب العین بنا کر جناب اقبال اؔدیب کاشی
پوری ایک عرصہ دراز سے شاعری کر رہے ہیں،آپ کا
پورا نام محمؐد اقبال اور قلمی نام اقبال
اؔدیب کاشی پوری ہے، آپ کا تعلق کاشی
پور کے ایک علمی و ادبی گھرانے سے ہے، آپ
کے والد کا نام مبارک حسین اؔحمر اور والد کا نام انوری بیگم ہے۔ اقبال اؔدیب9 جنوری
1954ء کو ہندوستان کی شمالی ریاست اُتّراکھنڈ کےترائی ضلع اُودھم سنگھ نگر کے تاریخی اور صنعتی شہر کاشی
پور میں پیدا ہوئے، انٹرمیڈیٹ تک تعلیم مکمل کرنے کے بعد انہوں نے اپنا کاروبار شروع کیا،اُردو
ادب اور موسیقی کا شوق اور گہری سمجھ رکھنے والے اقبال اؔدیب شاعری کو دنیا میں
بیداری پیدا کرنے کا ایک موثر ذریعہ مانتے
ہیں۔
آپکے والدِ محترم جناب احمرؔ کاشی پوری ایک مشہور اور کامیاب شاعر تھے، وہ اُردو ادب سے
گہری محبت رکھتے تھے اور ان کا شمار ملک کے نامور شاعروں میں کیا جاتا تھا، آپ نے
اپنے والدِ گرامی کی سرپرستی میں غزل کی باریکیاں سیکھیں اور انکے ساتھ بہت سے مشاعروں اور نشستوں میں شرکت فرمائی،آپ نے اپنی شاعری
میں روز مرہ کی چھوٹی بڑی باتوں کو بہت سادگی اور سادہ زبان میں
پیش کیاہے ، سادہ زبان اور عام فہم شاعری کی بدولت آپ کی
ہر جگہ تعریف کی گئی ، مشاعروں میں آپ کی شرکت کا سلسہ 1975 ءسےشروع ہوا اور اخبارات
میں آپ کے کلام کی اشاعت کا سلسلہ 1976 ء میں مقامی خبر
نامہ سے ہوا اسکے بعد روز نامہ ’ملاپ ‘’قومی جنگ‘اور دیگر کئی اخباروں اور رسالوں
میں آپ کی شاعری شائع ہوتی رہی،
آپنے کئی سالوں تک آل انڈیا ریڈیو
سے مستقل پروگرام پیش کئےہیں اس کے بعد آپنے ٹی وی چینل
زی سلام کے کئی مشاعروں میں بھی شرکت
فرمائی ، آپنے
پرانے دور کے مشہور و معروف شعرا ء کرام جیسے جناب گوہر عثماؔنی ، رئیس
رؔامپوری ، مو علی موؔج ،مونؔس بریلوی ، ہوش
نعماؔنی ، اظہر عناؔیتی ، وسیم بریلوؔی ،
ساحل سحرؔی ، ڈاکٹر شاکر حسین اؔصلا حی، فہمی ؔبدایونی، ظفرؔ کاشی پوری،نشؔتر کاشی پوری اورمنوؔج آریہ صاحب کے ساتھ طویل عرصے تک نشتوں
اور مشاعروں میں شرکت فرمائی، یہ تمام شعراء بھی آپ کی شاعری اور ہنر کے معترف رہے
ہیں، مقامی اعتبار سے جناب پرفیسر آصف
حسین، ڈاکٹر یوسف بہادُرخان ، ماسٹرمحمد فاروق، ماسٹر محمد ادریس، محمد عمر قاضی ،عزیز قریشی ،حنفی ؔکاشی پوری، پیاؔم کاشی پوری، ڈاکٹر اؔحمد کاشی پوری، خؔنجر کاشی پوری،عاؔصم
کاشی پوری، قتؔیل کاشی پوری ، مبارک حسین
مشؔفق، صغیر اؔشرف،انجینیر محمد اؔقبال، انجینیر عرفان حمید،اؔمیں جسپوری،اختر جسپوؔری نقی انؔور،
طفیؔل چتر ویدی اور نوچیتنا کلچرل کمیٹی کے سربراہ جناب وِمل گڑیا جی سے آپ کے گہرے مراسم رہے ہیں۔
آپ کے ادبی
اور علمی خدمات کے اعتراف میں آپ کو پریس کلب، لائنز کلب اور 20 کے قریب سماجی و
ادبی تنظیموں کی جانب سے اعزازات سے نوازا جا چکا ہے۔ جناب امتیاز غازی اِلہ آبادکی کتاب "صدی کے 100 شاعر" میں بھی آپ کے کے کلام کو شامل
کیا گیا ہے، آپ عرصہ دراز سے سماجی و تعلیمی ادارے شمس العلوم ہائی اسکول کاشی پور
کے سربراہ کی حیثیت سے خدمات سرانجام دے رہے ہیں۔
اگرچہ شاعری آپ کو وراثت میں ملی ہے لیکن سچی لگن اور محنت کی وجہ سے آپ نے اُردو ادب
میں اپنا ایک خاص مقام بنایا ہے آپ نے ہمیشہ اُردو کے مشکل اور پیچیدہ
الفاظ سے گریز کیا ہے، آپ نے غزل کو
اتنا آسان اور عا م فہم زبان میں دنیا
کےسامنے پیش کیا ہے گویا وہ قاری سے اُسی کی زبان
میں گفتگو کرتے نظر آتے ہوں ،
آپ کا کلام حسن وعشق اورجام و میناکے علاوہ آج کے
حالات کا بھی اظہار کرتا ہے اور معاشرے اور اس میں در پیش تمام چھوٹی بڑی پریشانیوں کی تر جمانی کرتا ہے۔
آپ کی شاعری میں آپکے والدِ
محترم کا رنگ تونظر آتا ہے لیکن آپکے یہاں جدید غزل کا رنگ
بھی دیکھنے کو ملتا ہے آپ کی شاعری ایک نوجواں کے دل کی کیفیت
بیان کرتی ہے جس کی وجہہ سے آج کے نوجوان
آپ کو اپنا آئیڈیل مانتے ہیں۔
آپ نے شاعری کے مختلف اصناف پر اپنی صلاحیتوں کا مظاہرہ کیا ہے جس میں خاص طور پر غزل، حمد،
قطعہ اور گیت شامل ہیں، آپ کے لکھے ہوئے کئی گیت نجی البموں کی زینت بن چکے ہیں
جنہیں محمؐد نفیس،اپورو پنت اور امحمدؐ نعیم نے بے حد خوبصوتی سے گایا اور فلمایا
ہے۔
آپ آج
بھی اپنی مصروفیات سے کچھ وقت نکال کر مقامی سطح پر اور مختلف شہروں میں ہونے والے مشاعروں اور
نششتوں میں شرکت فرماتے ہیں اورساتھ ہی ڈیجیٹل میڈیم کے ذریعہ مشاعروں کا انعقادبھی
کرتے ہیں، جناب اقبال اؔدیب آج بھی شاعری
سے گہرا لگاؤ رکھتے ہیں اور شعر کہنے کا یہ
سلسہ آج بھی جاری رکھے ہوئے ہیں،آپ کی شاعری کی یہ روایت یہیں ختم نہیں ہوتی آپ کے
صاحبزادے شارق صدیقی بھی ایک بہترین نو جوان شاعر ہیں وہ اپنے دادا محترم و والدِ محترم کی اس ورا ثت کو آگے بڑھانے کی ذ مہ داری بخوبی انجام دے رہے
ہیں،آپ کا خاندان تین نسلوں
سے کاشی پور جیسے غیر اُردو علاقہ میں
اُردو کی شمع کو روشن کئے ہوئے ہے۔
آپکے کلام
کو یکجا کرنے اور کمپوزٹنگ کرنے میں بڑی جانفشانی
کی گئی ہے جس کو اُردو اور ہندی
میں ایک ساتھ شائع کرایا جا رہا ہے، میں اس کا م کے لئے جناب پروفیسر
آصف حسین،بڑے بھائی اسراراحمد اور تمام دوست واقارب کا
مشکور ہوں جن کی کوشش اور مشوروں سے یہ مشکل
کام پایہ تکمیل کو پہنچ سکا۔
چونکہ
کوئی بھی عمل ختمی نہیں ہوتا اس میں ترمیم کی گنجائش ہمیشہ بنی رہتی
ہے ، اس لئے آپ سبھی حضرات سے گزارش ہے کہ اس انتخاب کو
مزید بہتر بنانے کے لئے اپنےنیک مشوروں سے نوازیں، مجھے نہ صرف امید
ہے بلکہ پورا یقین ہے کہ آپ اس ادنٰی سی کوشش کو ضرور سراہیں
گے۔
آپ کی دعاؤں کا
منتظر۔
ایڈیٹر
محمد جلیس صدیقی
علی خان کاشی پور،اتراکھنڈ

